Saturday, 28 May 2016

मैं हूँ ना माँ ---



आज दिल्ली से फ़ोन आया की देवर की हालत ज्यादा ख़राब है,सुनते ही रेवा का दिल बैठने लगा...जब शादी होकर आई थी यही मुन्नू आठवीं में था और उसे  लाडला देवर बेटे सामान प्यारा  था !एक बार देखने और मिलने को व्याकुल रेवा ने फिर से बेटे से चिरौरी की," चल ना राजू चाचा से एक बार मिल लेते हैं,जी घबरा रहा है मेरा !क्या तेरा मिलने को जी नहीं करता ?यह मत भूल की उनके अथक प्रयास से ही तुझे यह नौकरी मिली है वरना अच्छे-अच्छों को नसीब नहीं होती सरकारी नौकरी !"
" माँ,केंसर तो होता ही जानलेवा है !जाकर बचा थोड़े ही लेंगे हम,फिर मिल भी आये तो कुछ समय बाद तुम उनकी तेरह्न्वी पर जाने को कहोगी ?अब बार बार इतनी दूर छुट्टी लेकर जाना ..."
बेटे की बेरुखी देख बेबस माँ खून का घूँट पी अपने कमरे में घुसी तो वहां ससुराल से आई बेटी को बेग में कपडे रखते देखा तो पूछ बैठी," इतनी जल्दी कैसे ?"
"माँ,रस्ते के लिए खाना बना लो,मैंने अपने और तुम्हारे हवाई टिकेट बुक करा लिए हैं...."

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