Wednesday, 25 May 2016

बेटी बेचवा



सकट का बायना ननद को देने गयी तो  उनकी ख़ुशी चेहरे से छलकी पढ़ रही थी मानो कुबेर का खज़ाना हाथ लग गया हो !एकांत मिलते ही मैं खुद को रोक नहीं सकी," दीदी,आज कोई लौटरी लग गयी क्या जो आप ..."बात पूरी नहीं कह पायी थी कि दीदी ने मेरे हाथ में तीन- चार तस्वीरें रख दीं,जो एक सुन्दर सलौनी किशोरी की थीं और शायद विदेश से ! एक तस्वीर में वो मृगनैनी केक काट रही थी,दूसरी में अपनी माँ को केक खिला रही थी और तीसरी में एक सज्जन जो शायद उस किशोरी के पिता लग रहे थे वो उसके कंधे पर एक हाथ रखे दूसरे हाथ से उसे कार की चाबी पकड़ा रहे थे !लड़की का चेहरा  आश्चर्य मिश्रित ख़ुशी से दमक रहा  था !
" दी,यह मिष्ठी है ना ?" दीदी मुस्कुरा उठीं एक अनकहे गर्व के साथ ! मिष्ठी..उनकी सौत की पोती थी और आज जिस पादान पर वो पहुँच सकी है वहां तो उसकी सगी दादी भी नहीं पहुंचा सकती थीं !सुनंदा दी ..मेरी ननद,एक दुहाजू को ब्याही गयी थीं क्यूँ कि उनकी पीठ में कूबड़ था !जीजाजी ने उनसे शादी इसी शर्त पर की थी कि वो अपनी सौत की तीनो संतानों को पालेंगी और अपने बच्चे के लिए नहीं कहेंगी ! दीदी,ने भी नौकरी ना छोड़ने की अपनी शर्त रखी थी और साधारण रस्म के साथ उनकी शादी चार जनों की उपस्थिति में कर दी गयी !
तीनो बच्चों की शादी उन्होंने अपनी नौकरी से कर्जा लेकर की थी लेकिन "विमाता "का ठप्पा उनके माथे से कभी नहीं मिट सका बल्कि एक लांछन और लग गया था ! दरसल,छोटे बेटे की पत्नी एक बच्ची को जन्म देने के दस दिन बाद चल बसी थी ! बड़े बेटे से 2 बेटियां और बेटी से भी 2 बेटियां थीं और अब पांचवी बेटी का खर्चा उठाने की कुव्वत परिवार में किसी में नहीं थी !दूरदर्शी दीदी ने उस नन्ही सी जान को बिना किसी से पूछे सुदूर आस्ट्रेलिया में बसी अपनी बेऔलाद भतीजी को देकर उसकी गोद भरी थी,जिनके पास पैसा बेशुमार पर औलाद नहीं थी !
मुझे सोच में डूबे देख दीदी हंस कर करुण स्वर में बोली ," विमाता के साथ बेटी-बचवा सही, क्या फर्क पड़ता है मुझे ?"

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